रांची न्यूज डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में पुलिस और जेल हिरासत (Custodial Deaths) में होने वाली मौतों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले में प्रार्थी मोहम्मद मुमताज अंसारी ने अदालत से मांग की है कि राज्य में हुई इन मौतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
सुनवाई के मुख्य बिंदु
चौंकाने वाले आंकड़े: सुनवाई के दौरान गृह सचिव द्वारा दाखिल शपथ पत्र का उल्लेख किया गया। इसमें स्वीकार किया गया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच राज्य में कुल 500 लोगों की हिरासत में मौत हुई।
जांच में लापरवाही: इन 500 मामलों में से लगभग आधे मामलों में न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) नहीं कराई गई, जो कि स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन है।
कानूनी तर्क: प्रार्थी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) का हवाला दिया गया, जो हिरासत में मौत के मामलों में मजिस्ट्रेट जांच को अनिवार्य बनाती है।
हाईकोर्ट के कड़े निर्देश
इससे पहले की सुनवाइयों में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर सवाल उठाए थे। अदालत ने सरकार से स्पष्ट पूछा था कि:
हिरासत में हुई मौतों के बाद मानवाधिकार आयोग के गाइडलाइंस का पालन क्यों नहीं हुआ?
जिन मामलों में जांच नहीं हुई, उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई?
सरकार यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में ऐसी घटनाओं के बाद न्यायिक प्रक्रिया का कड़ाई से पालन हो।
यह फैसला आने वाले समय में राज्य की पुलिस और जेल प्रशासन की जवाबदेही तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। प्रार्थी का तर्क है कि बिना निष्पक्ष जांच के पीड़ितों के परिवारों को न्याय मिलना असंभव है और यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।