रांची न्यूज डेस्क: विश्व रक्तदाता दिवस के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य अधिकार संगठनों ने झारखंड में रक्त की कमी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि राज्य में पर्याप्त रक्तदान शिविर और जागरूकता अभियान नहीं चलाए जाने के कारण थैलेसीमिया समेत कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों को रक्त के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। कई परिवारों को जरूरत के समय रक्त इकाइयों की व्यवस्था करने के लिए भारी आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है।
स्वास्थ्य अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन लाइफ सेवर्स रांची के संस्थापक अतुल गेरा ने कहा कि झारखंड हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष दिसंबर में राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि मरीजों को रक्त पाने के लिए किसी अन्य दाता की व्यवस्था न करनी पड़े। इसके बावजूद राज्य के अधिकांश ब्लड बैंकों में रिप्लेसमेंट डोनेशन की व्यवस्था जारी है, जिससे मरीजों और उनके परिजनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था सुरक्षित रक्त आपूर्ति के लिए भी जोखिम पैदा करती है।
थैलेसीमिया मरीजों के लिए काम करने वाले संगठन ‘लहू बोलेगा’ के संस्थापक नदीम खान के अनुसार, झारखंड को हर वर्ष लगभग 10 लाख यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, जबकि इसकी आधी मात्रा भी उपलब्ध नहीं हो पाती। उन्होंने बताया कि स्वैच्छिक रक्तदान का योगदान केवल 15 प्रतिशत के आसपास है, जबकि अधिकांश रक्त रिप्लेसमेंट डोनेशन के जरिए जुटाया जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले कुछ महीनों से रांची के प्रमुख अस्पतालों में कुछ रक्त समूहों की उपलब्धता बेहद सीमित रही है।
इधर, स्वास्थ्य विभाग ने रक्त की उपलब्धता बढ़ाने के लिए निजी एजेंसी की सेवाएं लेने की योजना बनाई है। विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने बताया कि सरकारी ब्लड बैंकों में कर्मचारियों की कमी के कारण नियमित रक्तदान शिविर आयोजित करना चुनौतीपूर्ण है। प्रस्तावित एजेंसी रक्तदान शिविर आयोजित कर एकत्रित रक्त को ब्लड बैंकों तक पहुंचाएगी, जिससे जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराया जा सके। हालांकि सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस दिशा में तेजी से कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि रक्त की कमी के कारण किसी की जान खतरे में न पड़े।