रांची न्यूज डेस्क: प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी के वरिष्ठ नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा का शुक्रवार सुबह रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थे और बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद थे। 75 वर्षीय बोस को नक्सली आंदोलन में ‘किशन दा’ और ‘मनीष उर्फ बूढ़ा’ के नाम से भी जाना जाता था। बताया जाता है कि उन्होंने सुबह करीब 4 बजे अंतिम सांस ली और अपने अंतिम दिनों में जेल में धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते रहते थे।
प्रशांत बोस नक्सली आंदोलन के शुरुआती दौर के प्रमुख कमांडरों में गिने जाते थे। उन पर कई बड़े हमलों की साजिश रचने का आरोप था, जिनमें दीवाली के दिन पुलिस कैंप पर हुआ हमला भी शामिल है, जिसमें 15 जवानों की जान गई थी। वह संगठन की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे थे और लंबे समय तक विभिन्न राज्यों में सक्रिय रहे। सुरक्षा एजेंसियां उन्हें कई हिंसक वारदातों का मास्टरमाइंड मानती थीं।
बताया जाता है कि बोस बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नक्सली गतिविधियों को संचालित करते थे। वह माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल रहे, जिसका बाद में अन्य संगठनों के साथ विलय हुआ। संगठन के पुनर्गठन के बाद उनकी भूमिका और प्रभाव और भी बढ़ गया था, जिससे वह नक्सली नेटवर्क के अहम रणनीतिकार बन गए थे।
करीब चार दशक तक सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने रहने के बाद उन्हें 12 नवंबर 2021 को झारखंड पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और देशभर में उनके खिलाफ 100 से अधिक मामले दर्ज थे। बीमारी के चलते उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और अंततः इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही नक्सली आंदोलन के एक बड़े और पुराने चेहरे का अंत हो गया है।