रांची न्यूज डेस्क: क्या किसी व्यक्ति के अंग्रेज़ी बोलने का तरीका उसके काम करने की क्षमता से ज्यादा अहम हो सकता है? हाल ही में एक लिंक्डइन पोस्ट के वायरल होने के बाद यह सवाल फिर चर्चा में आ गया है। इस पोस्ट में भर्ती प्रक्रिया के दौरान एक्सेंट (लहजे) के आधार पर होने वाले भेदभाव को लेकर चिंता जताई गई है।
आयुष आर्यन चंद्रा द्वारा साझा किए गए इस पोस्ट में जयपुर में हुए एक इंटरव्यू का जिक्र है, जहां उनके दोस्त को कथित तौर पर सिर्फ “इंडियन एक्सेंट” होने की वजह से रिजेक्ट कर दिया गया या उसकी सैलरी कम करने की बात कही गई, जबकि उसकी अंग्रेज़ी पर पकड़ अच्छी थी। इस घटना ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है।
चंद्रा ने सवाल उठाया कि जब उम्मीदवार भारतीय हैं और काम भी भारत में करना है, तो उनसे विदेशी (खासकर अमेरिकी) लहजे में बोलने की उम्मीद क्यों की जाती है। उन्होंने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार अपने काम में सक्षम है और प्रभावी तरीके से संवाद कर सकता है, तो उसके एक्सेंट को आधार बनाकर निर्णय लेना गलत है।
इस मुद्दे ने कार्यस्थल पर समानता, निष्पक्षता और प्रतिभा के सही मूल्यांकन को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को उम्मीदवारों की स्किल्स और क्षमता पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनके बोलने के अंदाज पर।